Friday, 20 March 2015

यूँ ही कुछ..

गुलजार करने आया था वो बागबान मानिंद ,
गुलशन उजाड़ कर फिर वो मीर चल दिया..

हम तो हर्फ़ के सीने पे हर्फ़ लिखते चलते है,
ऊँचे हिमालय पर जमी हिम सी पिघलते है.
हम फूल या कंदील है जो भी समझ लो तुम,
हम दुश्मनो के दिल से भी मिल के निकलते है..

हम गंग बन जाये धरा की प्यास बुझती है,
हम संग हो जाएँ जहाँ हर शाख झुकती है.
हम ने ही दिलों में प्रेम का हर गीत छेड़ा है,
हम ही ठहर जाये,जहाँ वहां हर शाख झुकती है..
      ..atr

|| गुमनाम पत्र ||

|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...