अपरिपक्व विचारों के साथ सुबह जगा हुआ सूर्य दिन भर के संघर्षों, खुशियों, दुखों और विमर्शों को देखकर एवं सुनकर जब शाम को प्राप्त हो जाता है तो उसके विचार परिपक्व हो गए रहते हैं | ऐसी ही सांझ के विचार और विचारों की सांझ को अपने साथ लेकर प्रस्तुत हूँ मैं आपका अपना, अभिषेक | आइये आपको भी विचारों की इसी गंगा में ले चलें जो हृदयों की काशी में बह रही है |
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|| गुमनाम पत्र ||
|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...
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हे प्रणय रस प्रेम के कवि, हे मधुर संगीत के स्वर , इस अँधेरे गुप्त स्वर से मैं अमर संसार लिख दूँ| दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख ...
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फिर मुझको मेरा घर याद आया . अकेला था मेरा मन जब , न था कोई भी जब साया . फिर मुझको ….. मैं खाने जब भी जाता हूँ , तो माँ की याद आती है , अके...
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दबी जबान में चलो आज बात हो जाये , आँखों ही आँखों में अब मुलाकात हो जाये जज्बातों में अब आबरू बची भी रहे , चलो फिर आज दिल से दिल की बा...
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खड़ी है जिंदगी फिर पूछती घर का पता क्या है, मुझे याद नहीं है मीर तू ही जाकर बता क्या है.. बड़ी मुश्किल है बेचारी किधर जाये ख़बर क्या है? कभ...
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here is some para frm my long work describing the truth “death”.. hope u all ll like .. वेदो की वाणी भूल गयी ,ममता माया सब छूट ग...
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