Wednesday, 23 May 2018

|| गुमनाम पत्र ||

|| गुमनाम पत्र ||
(स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश )
-अभिषेक त्रिपाठी
माघ महीने के दोपहर की गुनगुनी धूप। एटलस साईकल की पैडल मारता हुआ रग्घू डाकिया तेजी से प्रताप बाबा के गांव वाले खड़ंजे पर भागा जा रहा था। गांव के पश्चिमी छोर पर पड़ने वाले सरकारी नलकूप से अपने गन्ने की फसल की सिंचाई कर रहे प्रताप बाबा ने तेज आवाज में बुलाते हुए कहा-
अरे रग्घू! इतनी जल्दी में कहां भागे जा रहे, आओ थोड़ा धूप ले लो। इतने दिन बाद तो सूरज देवता उगे हैं। किसकी चिट्ठी पहुँचानी है गांव में ?
'बहुत चिट्ठी है बाबा, मनीआर्डर भी तो आया है, महीना जो पूरा हुआ है।'
तेजी से ब्रेक लगाकर रुकते हुए रग्घू बोला।
'काशी से हमारे नाती की कौनो खबर नही आई ?
बोला था परिणाम आते ही संदेशा भेजेगा।'
बाबा ने यूँ ही बात बढ़ाते हुए कहा।
' बाबा तुम न जंगल हो , फंसा ही लेते हो। अब गन्ना चुह के जाऊंगा ।' हंसते हुए रग्घू बोला।
कुछ 10-15 मिनट के आराम और गांव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति से गुफ्तगू के बाद रग्घू ने फिर साईकल उठाई और गांव की ओर निकल पड़ा।
सबको चिट्ठी, मनीआर्डर देने के बाद जब रग्घू ने अपने झोले में अंतिम पत्र के लिए हाथ डाला
.... और उस पर लिखा हुआ पता पढा तो उसे यकीन ही नही हुआ। ये अंतिम पत्र तो उसके लिए ही था। उसके पते पर, उसके नाम से। लेकिन उसका तो कोई अपना नही था, कोई दूर का रिश्तेदार भी नही।
फिर ये चिट्ठी किसने भेजी है उसे।
वह उसे खोलने ही वाला था कि सामने से आती हुई आशीष की माँ ने उससे पूछा
'पता नहीं इस बार भी आशीषवा का आईयस नही हुआ का? पता नहीं कब आएगा वो घर, कब तक इलाहबाद में ही रहेगा, उसकी पत्नी को देखो अब तो बोलना भी भूल गयी है। न तो वो कलेक्टर बनने की कौनो खबर भेज रहा है और न ही घर आ रहा है। '
'अरे नही अम्मा आशीष बेटवा जरूर कलेक्टर बन के आये।
और तुहे सबका अपने साथ कोठी में लेकर रहे। कुछ दिन और सब्र करा।' - रग्घू ने बुढ़िया मां को ढांढस बंधाते हुए कहा।
उस मां और पत्नी की वियोगी आंखे और उनमें शिकायत को वो भलीभांति देख सकता था, कम से कम महसूस कर सकता था।
उसे याद आया कि कलेक्टर बनने का संदेश लिए हुए एक ऐसा ही पत्र जब उसने उन बूढ़े माँ, बाप को दिखाया था जो अपने विशिष्ट प्रयाण की प्रतीक्षा में थे, तो उनके चेहरे पर वैसी ही रौनक लौट आयी थी जैसी उनके युवावस्था में उस पुत्र के जन्म के समय हुई थी। हालांकि इन खुशियों के साथ वो बहुत दिन तक जीवित नही रहे पर उन चंद क्षणों में ही उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन का सुख भोग लिया हो ऐसा प्रतीत हुआ था।
कुछ ऐसे ही चमत्कार की उम्मीद वो उस मां और पत्नी के लिए भी करता था। और उसे लगता था कि कलेक्टर बनने का संदेश वह खुद आकर उन्हें सुनाएगा और उस जीर्ण और कपटविहीन चेहरे तथा झुर्रियों के बीच उस चमक को देख सकेगा जिसे देखे हुए उसे मुद्दत हो गयी थी।
इन सब बातों के बीच वह उस गुमनाम पत्र के बारे में भूल ही गया।
जब वह गाँव से लौटा तो संध्या हो चली थी, सूर्य अस्ताचलगामी हो गए थे।
ठंड बढ़ चली थी , उसने अपने झोले से शाल निकाल कर ओढ़ लिया। हल्की हल्की धुंध छाने लगी थी। जब वह उस सरकारी नलकूप से गुजरा तो बाबा जा चुके थे।
उबड़ खाबड़ रास्तों से चलता हुआ वो चौड़ी सड़क तक आ गया। और फिर अपने घर की तरफ मुड़ गया।
थकान बहुत ज्यादा हो गयी थी। उसके कच्चे घर की खिड़की टूटी हुई थी जिससे ठंडी हवा बराबर उसके बिस्तर तक आ जाती थी।
वो एक कंबल और शाल के साथ ही रात गुजारने को मजबूर था। सोचा कि कल अगर समय मिला तो आज मनीआर्डर की मिली हुई बख़्शीश का एक ऊनी कपड़ा खरीदूंगा। जीवन के इन्ही संघर्षों के उधेड़बुन में पड़े हुए उसे नींद आ गयी।
दूसरे दिन जब वह डाकखाने पहुँचा तो उसने आयी हुई चिट्ठियों पर लिखे हुए नाम पढ़ने शुरू किए। वह आश्चर्य से देखता रहा जब उसने वो पत्र देखा जिस पर उस बुढ़िया माँ के घर का पता लिखा हुआ था ।
तुरन्त ही सारे पत्र उठाकर वो गाँव की तरफ भागा। आज उसकी साईकल सीधा उस बुढ़िया मां के घर के सामने आकर रुकी। उसने देखा बूढ़ी मां बदली वाली हल्की धूप में बैठी , धान के पुवाल का गद्दा बना रही थी।
आशीष की माँ के पास पहुंच कर रग्घू बोला
अम्मा तोहरो नाम से चिट्ठी आय बा,कहा तो पढ़ के सुनाई!
हां तो सुना न! हमे कहाँ कुछ पता चलता है उसमें।
रग्घू ने पत्र पढ़ना शुरू किया। चिट्ठी पूरी होते होते रग्घू और बूढ़ी माँ दोनो की आंखे भीग चुकी थीं। आशीष कलेक्टर बन गया था। 7 दिन बाद घर आने की सूचना पत्र में लिख कर भिजवाया था उसने।
आशीष की बढ़ी मां की चमकती आंखे और भाव विभोर चेहरा देख कर काफी देर तक रग्घू कुछ सोचता रहा , फिर बोला
हम कहते रहे न अम्मा की बेटवा एक दिन कलेक्टर जरूर बने।
काली चौरा पर लड्डू चढ़ाऊ तो हमे भूल न जाऊ प्रसाद दे का।
बुढ़िया कुछ बोल नहीं पाई, खुशी के आंसुओं से उसका गला रूंध गया था ।
अचानक रग्घू को जैसे बिजली लगी हो, वो झटककर उठा और अपनी साईकल की तरफ दौड़ा।
गांव के हरे रास्तों से सीधा अपने घर की तरफ ।
जैसे ही वह घर पहुँचा, उसने तुरंत ही वो गुमनाम पत्र ढूंढा जो उसके पते पर आया था ,उसके नाम से।
दूसरे दिन सुबह ... वो डाकिया रग्घू डाकखाने नहीं पहुँचा। पहुंची एक खबर... कि रग्घू को मोक्ष मिल गया है।
उस निर्जीव रग्घू के पास खुला हुआ पड़ा था वह पत्र जिसमे लिखा था.........
#क्रमशः
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अभिषेक त्रिपाठी

|| गुमनाम पत्र ||

|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...