Saturday, 5 May 2018

||अगस्त की सुबह और तुम ||

||अगस्त की सुबह और तुम ||
(काल्पनिक, किसी जीवन से सम्बन्ध एक सयोंग )
अगस्त की सुबह। जगा तो 10 बज रहे थे। होस्टल के कमरे की खिड़की से झांककर बाहर देखा तो मूसलाधार बारिश हो रही थी।
चादर हटाया और पंखे को बंद करके कमरे से बाहर आ गया । बालकनी में खड़े होकर होस्टल के मैदान में तेजी से बरसती बूंदों को देख ही रहा था अचानक से छज्जे से टपकती बूंदों के सर पर गिरने से तंद्रा टूटी।
हां, अगस्त ही तो था न पिछले साल। पीछे खड़ी थी वो |
अरे! तुम ?
अगस्त ही तो था न पिछले साल |
हाँ पर तुम अचानक कैसे ? वो भी यहां ? मुझे बस अगस्त ही नहीं सब कुछ याद है|
याद है सुबह 9 के बाद जगने वाले आलसी को तुमने 7 बजे ही फ़ोन किया था और मीठी आवाज़ में कहा था
'Morning walk पर चलें?'
और 10 मिनट के अंदर मैं तुम्हारे साथ था। बादलों से घिरा हुआ पूरा आसमान जैसे हम दोनो की उस मुलाकात को छुपाने के लिए चादर बन गया था। एग्रीकल्चर फार्म में पहुचहते ही तुमने हाथ झटक कर कैसे मेरा हाथ अपने हाथ मे ले लिया था और फिर तुम्हारे चेहरे पर वो खुशी देखकर मैंने बस ये सोच लिया कि इस मुस्कुराहट को कभी जाने नही दूंगा तुम्हारे होठो से।
और फिर शुरू हुई जोरदार बारिश से छुपने के लिए कैसे हम उस बरगद के बड़े से दरख़्त के नीचे खड़े हो गए थे, उस बारिश ने हमे कितने नजदीक ला दिया था।
तुमने तुरंत ही बाहें फैलाकर मुझे आलिंगन के लिए आमंत्रित किया और मेरे सकुचाने पर तुमने खुद ही कस लिया था खुद में मुझे।
तब तक के जीवन का पहला चुम्बन था वो, जिसकी गर्मी आज भी मेरे होंठो से ग़ज़लों के साथ निकल आती है। उस सुबह बारिश में मैं पूरा भीग गया था कुछ बरसते पानी से और कुछ बरसते प्यार से |
पहली मुलाकात भी हमारी कुछ अजीब ही रही। मैं मधुबन गोष्ठी में कवियों को सुनने गया था और तुम अपने best friend को उसके boy friend से मिलाने ले गयी थी। सवाल आजतक जेहन में आता है तुम्हारा वहां क्या काम था। हँसी भी आती है तुम्हारी उस अपरिपक्वता पर।
मैं हसरत मोहानी को गुनगुनाते हुए उधर से ग़ुज़र ही रहा था कि तुम्हारी चंचल आंखों ने मेरे स्थिर बुद्धि और हृदय पर आघात कर दिया। जैसे जड़ हो गया था मैं। फिर मुलाकातें होती रहीं और हम एक दूसरे को और भी अच्छे से जानते रहे |
मैं ग़ुलाम अली को गुनगुनाता तो तुम मुझे जॉन कीट्स का प्रेम सिखाती । मैं सरकारी स्कूल से भागने के किस्से बताता तो तुम कान्वेंट स्कूल की कहानियां सुनाती। मैं हीगल दर्शन, वेदांत दर्शन, फ्रांस, और रूस की क्रांति समझाता तो तुम मुझे बस सुनती रहती। तुम्हारा वो सवाल की तुम हमेशा दर्शन की book लेकर चलते हो, तुम्हे दर्शन से इतना प्यार क्यों है।
उत्तर आज भी मेरे पास नही है पर वो दर्शन भी तुम्हे समझने के लिए पर्याप्त नही थे ।........
तभी अचानक लगा जैसे किसी ने झकझोर दिया हो। जैसे दरख़्त टूटने से आसमान खाली हो जाता है, और मिट जाते हैं परिंदों के वो आशियाने, बरसते पानी के साथ बह जातीं है सारी मेहनत और शायद आने वाले बच्चे भी ।
कुछ ऐसा ही खालीपन महसूस हुआ लगा कि अंदर कुछ टूट रहा है। इसी ख्वाब में कब 12 बज गए थे पता ही नही चला।
बारिश कम हो गयी थी छोटी छोटी बूंदे आसमान से नाचती हुई आ रही थी। यादों की गर्मी इतनी हो गयी थी कि अब खड़ा नही रह सकता था।
BHU की सड़कों पर घूमने निकल गया एकदम तन्हा। सर पर गिरती बूंदे और ठंडी हवा के थपेड़ों से यादों का तूफान उठ खड़ा हुआ था।
रास्ते में कुछ एक बाइक और छात्रों का गुट ही दिखा, सड़के खाली थी शायद उसकी वजह थी।
कहतें हैं प्रेम के कवि के लिए सावन अमृत होता है। जहाँ वो अपनी सारी भावनाएं उड़ेल सकता है वो भी पूर्णता के साथ।
तन्हाई और यादों के बीच जद्दोजहत करता हुआ मैं विरला मंदिर पहुँच चुका था। यही वो जगह थी जहाँ हम सबसे ज्यादा मिले थे , उसके बाद तो घाट प्रमुख स्थान हुआ करता था |
आज भी जब मैं खुद को तन्हाई के पाले में रखकर देखता हूँ तो जैसे तुम कहती हो कि आओ न इधर , मैं न सही मेरी यादें तो है।
और जब तुम्हारी यादों का तसव्वुर करता हूँ तो उस ओर दिखती है मेरी ही परछाई , जो गंगा की लहरों के साथ बह जाना चाहती है और बनारस उसे जकड़ लेता है, उस सुबह की तरह...
अजब आये खुशी देने अजाबत नाम कर डाली,
मेरी तन्हाई भी तन्हा पड़ी रोती है रातो में।
...atr
क्रमशः ...

Abhishek Tripathi

|| गुमनाम पत्र ||

|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...