Saturday, 5 May 2018

|| इतिहास और दुर्ग अर्थात किला ||


काफी शोर शराबे के बीच कुछ दिनों पहले यादृच्छया मैं लालकिले का इतिहास पढ़ रहा था | जिस लालकिले ने शाहजहां के शाही आगमन से लेकर बहादुर शाह जफ़र के निर्वासन को देखा हो | जिसने अंग्रेजों के कैदखाने के रूप में खुद को महसूस किया हो , और जिसने आज़ाद भारत के तिरंगे का स्वागत अपने विशाल वक्ष पर किया हो | कितने सारे इतिहासों को समेटे हुए है लालकिला | ऐसे ही कितने सारे किले हैं जिनका अपना इतिहास है, अपनी कहानी है और अपना जीवन है | पर क्या किलों का ही इतिहास होता है ? नहीं ! इतिहास के भी किले होते हैं| वो किले जो कई शिल्पी इतिहासकारों द्वारा बनाये जाते हैं , वो किले जिनमे हर रोज एक नया निर्माण होता है और शायद वो किले भी, जो ढहा दिए जातें हैं |
इतिहास का अपना एक लालकिला है जिसमे दीवाने आम से लेकर दीवान ए खास तक एक तबियत से बनाए गए हैं | जिसमें कालिदास, ह्वेनसांग, फाह्यान, अबुल फज़ल जैसे कितने सारे इतिहास के शिल्पकारों ने अपने अपने महल बनाएं है| इसी किले में सभ्यताओं की नहर ए बहिश्त बहती है जो चलकर सीधा वर्तमान तक आती है | पर इसी किले में कही कहीं पर खून के छींटे भी दिखते हैं , ये उन उग्र और पक्षपाती शिल्पियों द्वारा किए गए है जिन्हे किले से नहीं बल्कि राजा से मोहब्बत थी |
इस इतिहास के लालकिले में कितने बार महलों को तोडा गया , कितनी बार उन्हें पुनर्जीवित किया गया और कितनी बार उनका स्वरुप ही बदल दिया गया | हमें तो ये भी नहीं पता कि ये किला जैसा आज दिखता है क्या सच में वैसा ही पहले भी था ?
इस नवीनतम प्राचीन किले में प्रवेश करते ही आप खुद को बाहर छोड़ दीजिये और किले की यात्रा पर निकल जाइये जो आपको गुजरे हुए पल से लेकर आज़ाद भारत के नायकों और द्रोहियों से होता हुआ ग़ुलाम भारत और मुग़लिया तथा सल्तनतकाल के महलों से परिचित कराते हुए पृथ्वीराज चौहान की शौर्यगाथा के बागों के किनारे से विक्रमादित्य
के आदर्श साम्राज्य के विशेष शीश महल से निकलता हुआ चाणक्य की चोटी के वटवृक्ष तक लेकर जायेगा और शायद उसके भी परे सिद्धार्थ के बुद्ध बनने की पगडण्डी पर भी | क्यूंकि इतिहास तो फिर इतिहास है न !
जब इस यात्रा से आप वापस आएं तो संभव है कि आपका वो क्षण जिसमे आपने प्रवेश लिया था वो अब इतिहास के इस किले का ही एक हिस्सा हो| यह बहुत विशाल है, भव्य और सुन्दर है | साथ साथ यह टूटा हुआ, टपकता हुआ , खूनों से रंगी दीवारों वाला और अपने राजाओं के मृत्यु पर कभी शोक मनाता हुआ और कभी मंगल गीत जाता हुआ मिल जायेगा | यह मृत नहीं है , ये जीवित है जो हर क्षण बढ़ रहा है , आयाम में और शायद दिलों में भी |
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अभिषेक त्रिपाठी

|| गुमनाम पत्र ||

|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...