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गरीबों की रोटी

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं।

फ़िराक़ गोरखपुरी की ये ग़ज़ल ज़िंदगी और महबूबा के विषय में तो ठीक है , क्योंकि वहां  पर काफी कुछ काल्पनिक भी होता है , परन्तु असल जिंदगी में बहुत दूर से पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है, नहीं ?
काशी  हिन्दू विश्वविद्यालय के विषय में आजकल कुछ ऐसा ही हो रहा है | लोग बहुत दूर दूर से जान , पहचान जा रहे हैं| और बस आहट ही क्यों , आहट की फ्रीक्वेंसी , एम्पलीट्यूड, पिच सब कुछ जान ले रहे हैं | यकीन मानिये उनकी मापन क्षमता इतनी विशुद्ध है कि लुटियंस दिल्ली  से  दक्कन के पठार   पर होकर   भी उन्हें  एकदम  सटीक  ज्ञान  है की उनकी जिंदगी (BHU) की आहट में कौन  कौन  सी  आवाज़े हैं| पिछले  एक  सप्ताह  से लगातार  इतने  सारे   आर्टिकल  लिख  दिए  गए , और लिखने वाले लोगो में कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने या तो BHU को कभी देखा नहीं है या फिर वो आज तक इसके अस्तित्व को मानते ही नहीं थे क्यूंकि उनके लिए जो दिल्ली में है वही विश्वविद्यालय है यहाँ तो बस खिचड़ी पकाई जाती है |  ये वो लोग हैं जिनको न तो BHU के स्थापना का उद्देश्य पता है और …

तुम्हारे हिज़्र में

दो दिन की मुलाकात थी, आधी अधूरी बात थी,
वो छोड़ के चला गया , जिंदगी उदास थी|
एक रात मैं सोया हुआ, ख्वाब में वो आ गया ,
सोये हुए दर्द को फिर से जगा गया |

पर  मीर वक़्त का क्या कहिये, हर चीज़ को चकमा देती है,
हर शख्स ग़ुलामी करता है, हर चोट को फिर भर देती है|

था मेरा हाल बुरा उस दिन , जिस दिन वो छोड़ के भागा था,
पर अब देखो मैं हँसता हूँ , पहले मैं बड़ा अभागा था|
 ज़िन्दगी की यही कहानी है, यह  दुनिया ही दीवानी है,
कोई न किसी का दोस्त यहां , हर रिश्ता पर रूमानी है|
हर वस्ल  में खुश्बू होती है , हर हिज़्र में आंसू  बहते है|
न कोई हकीकतगोई है , सपनों का , ख्वाबों का धोखा|

उस ख्वाबों में जीने का अपना ही एक एहसास है,
पहले वो जितना पास था , अब भी वो उतना पास है|

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कभी जब शाम हो जाये , सुबह के गीत गया कर.

कभी जब शाम हो जाये , सुबह के गीत गया कर.
ये रातें भ्रमित करती है, न इस चक्कर में आया कर.

कभी सांसों में अटकी हो किसी के प्यार की खुश्बू,
फ़िज़ा महकाना चाहे तो  मीर को गुनगुनाया कर.

जिंदगी प्रेम है, उत्साह  है , आनंद पूरा है,
सलीके से जियें , हर पल का बस उत्सव मनाया कर.

ग़ज़ब की सादगी थी मीर उसके हिज़्र में देखो,
वो ख्वाबों में चली आयी ये कहने , "मुस्कराया  कर"

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मुक्तक

सफेदी ओढ़ कर यूँ चाँद तंग मुझको न कर तू ,
कफ़न जिस दिन भी ओढूंगा , ज़माना सारा रोयेगा.
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तेरा घर

मुझे कुछ भी कहीं पर याद आये तो तेरा घर हो,
ग़र कहीं पर जान जाये तो तेरा घर हो.
नियति मासूक से मिलने का मौका भी नहीं  देगी,
ग़र कहीं दीदार हो जाये  तेरा घर हो.
बदन पर सिलवटें दिखने लगी है  उम्र बाक़ी है,
कहीं ग़र रूह भी मुरझाना चाहे तो तेरा घर हो.
विदाई के समय रोये थे हम दोनों गले मिल कर ,
वो आंसू  आँख से गिर जाना चाहें तो तेरा घर हो.
मुकद्दर ने लिया है  छीन मुझसे दोस्ती का सुख,
कभी जब दुश्मनी आज़माना चाहे तो तेरा घर हो.
मुझे कुछ भी कहीं पर याद आये तो तेरा घर हो.
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प्रेम का नवगीत

दिल हमारा गा रहा है प्रेम का नवगीत फिर से ,
आँख से झर झर निकलते अश्रु  का संगीत फिर से.

ज्यों  की पंकज  फूलने  से पूर्व  खुद को धो रहा हो ,
या कि किसलय गर्भ के पश्चात जी भर रो रहा हो.
वेदना  के चरम पर आनंद का नवगीत फिर से,
आँख से झर झर निकलते अश्रु  का संगीत फिर से.

ज्येष्ठ की तपती दुपहरी में की ज्यों बरसात होगी ,
या की सावन के अमावस में चमकती  रात होगी ,
गुनगुनायेंगे सितारे, चांदनी गायेगी मेरे गीत फिर से ,
आँख से झर झर निकलते अश्रु  का संगीत फिर से.
दिल हमारा गा रहा है प्रेम का नवगीत फिर से|
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उजाले की ओर

हे प्रणय रस प्रेम  के कवि, हे मधुर संगीत के स्वर ,
इस अँधेरे गुप्त स्वर से मैं अमर संसार लिख दूँ|
दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख दूँ|

नेह लिख दूँ द्वेष के ऊपर विजय अपरिहार्य  लिख दूँ ,
दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख दूँ|

वीरता का शस्त्र थामे , कायरों की भीड़ पर मैं ,
इस अशासित द्वन्द पर , लेख से प्रहार लिख दूँ|
दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख दूँ|

जब घृणा हो विकट युग में , दिल निचोड़े जा रहे हों ,
खींचकर सब विष ह्रदय से , प्रेम का व्यापर लिख दूँ|
दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख दूँ|

सब थके हों आलसी हो, भोर की न हो खबर जब ,
खींच के एड़ी धरा पर फिर से मैं रफ़्तार लिख दूँ|
दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख दूँ|

भय, निराशा , क्रोध से बीमार जब लगने लगे,
वीरता , उम्मीद , चुम्बन का अटल उपचार लिख दूँ|
दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख दूँ|

हे प्रणय रस प्रेम  के कवि, हे मधुर संगीत के स्वर ,
इस अँधेरे गुप्त स्वर से मैं अमर संसार लिख दूँ|
दो मुझे ऐसी कलम , मैं शत्रु की तलवार लिख दूँ|