Saturday, 5 May 2018

|| यात्रा और नदियां ||

वर्षों से ये विचार कर रहा था कि बनारस में रहकर सबसे ज्यादा किसी से कुछ मिला तो क्या मिला! जवाब तो आज भी स्पष्ट नहीं है पर ये जरूर लगता है की गंगा ने बनारस को बहुत कुछ दिया और फिर बनारस ने हमें | हालाँकि बनारस की आत्मा में ही कबीरी है, मन में तुलसी हैं सद्भावना में रविदास हैं और शायद उन सबसे कहीं ज्यादा हर कण में महादेव और गंगा हैं |
दोआब क्षेत्र में जन्म होने के कारण नदियों से तो शुरुआत से ही जुड़ाव रहा | तमसा नदी जिसे टोन्स भी बोलते हैं (कारण ज्ञात नहीं ) के पास बचपन बीता और फिर सरयू का साथ रहा | बनारस में रहते रहते तो गंगा ने अपना बना लिया | जैसे जैसे नदियों का इतिहास और भौगोलिक जानकारी आगे बढ़ी तो ऐसा लगने लगा है कि यही सदानीरा अब बुलाने लगीं है |
कालिंदी (यमुना) और गोदावरी दो ऐसी नदियां है जो मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती हैं | वो अलग है की यमुना को मिटा दिया गया है, शायद कुछ वर्षों के बाद असि और वरुणा की तरह गंगा भी मृतप्राय हो जाएँ |
तीसरी नदी जो मुझे देखनी है वो है टोंस (उत्तराखंड और हिमाचल ) और शायद सिंधु भी |
अब जब भी घाट पर जाता हूँ तो हर बार आजतक भारतीय गणराज्य पर शासन करने वाले उन अहंकारी और कपटी नेताओं की सुध आती है जिन्होंने आज तक गंगा और अन्य नदियों के नाम पर लूट मचाई है | समाधि लेने वाली उमा भारती , गंगा के बेटे मोदी , और उनसे पहले के भी सारे लोग!
शायद तुम्हे क्रांति की आहट न सुनाई पड रही हो , लेकिन जल्द ही क्रांति होगी और फिर एक ऐसे युग और व्यवस्था का निर्माण होगा जो कल्पना से भी परे है |'

Abhishek Tripathi

|| गुमनाम पत्र ||

|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...