Friday, 20 March 2015

मुक्तक 1

मोहब्बत के सवालों से मैं अक्सर अब मुकर जाता ,
कहीं बातो ही बातों में मैं कुछ कहकर ठहर जाता..
कि तेरा नाम भूले से जबां तक आ गया ग़र तो,
तू बदनाम हो जाये न इससे मैं सिहर जाता ...
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|| गुमनाम पत्र ||

|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...