प्रेम की खोज

मैं प्रेम ढूंढता रहा कठोर सी जुबान में ,
पत्थरों के शोर में और दुश्मनो के गावँ में|

जहाँ न कोई प्रीति है न है ख्याल भाव का ,
न भावना की छाव है न सत्य आसमान सा,
बहुत बढे चले गए हमें तो कुछ मिला नहीं ,
 भटक भटक के रह गए बस्ती ए बीरान में |
पत्थरों के शोर में और दुश्मनो के गावँ में|

झूठ का कराल रूप देखकर सिहर उठा ,
प्रधान भाव शून्य हो मैं रात को क्यों रो पड़ा,
जला दिया "दिया" ख़ुदा के नाम लेखनी उठी,
 फिर लिखा जुबान में, शिशिर लगे मक़ान में|
पत्थरों के शोर में और दुश्मनो के गावँ में|

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