अपरिपक्व विचारों के साथ सुबह जगा हुआ सूर्य दिन भर के संघर्षों, खुशियों, दुखों और विमर्शों को देखकर एवं सुनकर जब शाम को प्राप्त हो जाता है तो उसके विचार परिपक्व हो गए रहते हैं | ऐसी ही सांझ के विचार और विचारों की सांझ को अपने साथ लेकर प्रस्तुत हूँ मैं आपका अपना, अभिषेक | आइये आपको भी विचारों की इसी गंगा में ले चलें जो हृदयों की काशी में बह रही है |
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|| गुमनाम पत्र ||
|| गुमनाम पत्र || (स्नातक के समय लिखा हुआ अपूर्ण , परित्यक्त ग्रामीण अंचल पर आधारित उपन्यास का एक अंश ) -अभिषेक त्रिपाठी माघ महीने के दो...
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सफर शुरू हुआ है मगर मंज़िलें नज़दीक है… ज़िंदगी जब जंगलोके बीच से गुजरे, कही किसी शेर की आहट सुनाई दे, जब रात हो घुप्प ,चाँद छिप पड़े, तब स...
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तेरी चाहत में इतना मैं पराया हो गया खुद से , कि दिल मेरा है फिर भी बात करता है सदा तेरी.. कभी वो चांदनी मेरी थी, अब पावस की है यह रात...
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